मिस्टर ज्यूडिशियल सर्वेंट कहकर बुलाने पर हंगामा
नई दिल्ली/लखनऊ, संवाददाता : देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) में एक मामले की सुनवाई के दौरान कोर्टरूम में जजों पर कागज उछालने और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने का एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है। इस घटना को लेकर देश के विधि विशेषज्ञों ने गहरी चिंता जताई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसी घटनाओं पर सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो आम जनता के मन में न्यायपालिका के प्रति सम्मान कम हो सकता है।
यह पूरा मामला उत्तर प्रदेश से जुड़े एक केस की पैरवी के दौरान हुआ। लखनऊ की जानकीपुरम कॉलोनी में किराए पर रहने वाले एडवोकेट प्रबल प्रताप सुप्रीम कोर्ट में अपनी याचिका की पैरवी कर रहे थे। सुनवाई के दौरान उन्होंने कोर्टरूम में अचानक हंगामा शुरू कर दिया। आरोप है कि उन्होंने पहले तो न्यायाधीशों को ‘मिस्टर ज्यूडिशियल सर्वेंट’ कहकर संबोधित किया और फिर अपनी फाइल के कागज जजों की तरफ उछाल दिए। जब सुरक्षाकर्मियों ने बेकाबू वकील को काबू में किया, तो उसने सीजेआई के लिए भी आपत्तिजनक और अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल किया।
सुप्रीम कोर्ट ने दिखाई दरियादिली
इतने बड़े हंगामे और अभद्र व्यवहार के बावजूद सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने अपनी उच्च मर्यादा का परिचय दिया। न्यायाधीशों ने वकील के प्रति सहानुभूति जताते हुए कहा कि वह हताश और मानसिक रूप से परेशान लग रहा है। न्यायालय ने मानवीय आधार पर वकील को बिना किसी दंडात्मक कार्रवाई के माफ कर दिया। उत्तर प्रदेश बार काउंसिल के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता शिरीष मेहरोत्रा ने इस घटना को घोर अनुशासनहीनता करार दिया है। उनके अनुसार: वकील अपनी किसी समस्या से पीड़ित हो सकते हैं, लेकिन देश की सर्वोच्च अदालत में ऐसा आचरण करने का तरीका पूरी तरह गलत है। न्यायाधीश कोई ‘सर्वेंट’ नहीं होते, उन्हें इस तरह संबोधित करना न्यायपालिका का अपमान है। भले ही न्यायालय ने अपनी उदारता दिखाते हुए कोई एक्शन नहीं लिया, लेकिन बार काउंसिल इस अनुशासनहीनता पर संज्ञान लेकर वकील के खिलाफ कड़ा कदम उठा सकती है। बरेली की एमजेपी रुहेलखंड यूनिवर्सिटी के लॉ डिपार्टमेंट के डीन प्रोफेसर अमित सिंह ने इस घटना पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उनका कहना है कि वकीलों से हमेशा न्यायालय के सर्वोच्च सम्मान की अपेक्षा की जाती है।
प्रोफेसर अमित सिंह का बयान: “ऐसा लगता है कि नई पीढ़ी के कुछ लोग कम समय में सस्ती लोकप्रियता और ‘रीलबाजी’ के लिए कोर्टरूम में इस तरह के स्टंट करने लग गए हैं। पिछली बार भी सीजेआई के साथ हुई ऐसी ही एक घटना में कोर्ट ने दरियादिली दिखाई थी और इस बार भी माफ कर दिया। लेकिन अब समय आ गया है कि न्यायालय को अपनी गरिमा बनाए रखने के लिए दंड देना शुरू करना चाहिए।” विधि विशेषज्ञों का तर्क है कि आज कोई कोर्ट में कागज उछाल रहा है तो कोई जूता। अगर यह सिलसिला नहीं रुका, तो आम जनमानस का भरोसा अदालत से उठ जाएगा। न्यायालय की अवमानना कानून के तहत ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, क्योंकि देश के हर नागरिक की यह जिम्मेदारी है कि वह भारतीय सेना और न्यायपालिका की मान-प्रतिष्ठा को अक्षुण्ण रखे।






















