शाम के समय जलाएं घी का दीपक
नई दिल्ली, संवाददाता : हिंदू पंचांग के अनुसार आषाढ़ माह भगवान विष्णु की आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इसी माह से भगवान विष्णु चार महीने के लिए योग निद्रा में चले जाते हैं, जिसे चातुर्मास कहा जाता है। चातुर्मास के दौरान विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाता है। वहीं, इस अवधि में पूजा-पाठ, जप, तप, दान और धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व माना गया है।
भगवान विष्णु को तुलसी अत्यंत प्रिय है। इसलिए आषाढ़ माह में तुलसी पूजन करने से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होने की मान्यता है। आइए जानते हैं तुलसी पूजन की विधि और इस माह में किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।
ऐसे करें तुलसी पूजन :
तुलसी में जल अर्पित करें
पूरे आषाढ़ माह में प्रतिदिन प्रातःकाल तुलसी के पौधे में जल अर्पित करें। जल चढ़ाते समय भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें और श्रद्धापूर्वक प्रणाम करें। मान्यता है कि इससे घर में सुख-समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है। हालांकि, रविवार, एकादशी तथा सूर्य या चंद्र ग्रहण के दिन तुलसी में जल अर्पित नहीं करना चाहिए।
शाम के समय घी का दीपक जलाएं
प्रतिदिन संध्या के समय तुलसी के पास घी का दीपक जलाएं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ऐसा करने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और घर में सुख-शांति का वातावरण बना रहता है। साथ ही भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। पूजन के बाद तुलसी की 7, 11 या 21 बार परिक्रमा करें। मान्यता है कि इससे जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और परिवार में खुशहाली बनी रहती है।
भगवान विष्णु को तुलसी दल अर्पित करें
आषाढ़ माह भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है। इसलिए प्रतिदिन भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी दल अवश्य अर्पित करें। धार्मिक मान्यता के अनुसार, तुलसी के बिना भगवान विष्णु की पूजा और भोग दोनों अधूरे माने जाते हैं। भगवान विष्णु के इन मंत्रों का करे जाप, ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।, ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्।
क्या नहीं करना चाहिए
- तामसिक भोजन जैसे मांस, मदिरा, अंडा, मछली, लहसुन और प्याज का सेवन करने से बचें।
- नशीले पदार्थों का सेवन न करें।
- विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और अन्य मांगलिक कार्यों से परहेज करें।
- धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस माह में हरी पत्तेदार सब्जियों का सेवन नहीं करना चाहिए।























